अचला एकादशी

अचला एकादशी 2018 – अचला एकादशी की कहानी, व्रत विधि

ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को अचला एकादशी 2018 कहते हैं। इसे अपरा एकादशी भी कहते हैं। इस व्रत के करने से ब्रह्महत्या, परनिन्दा, भूत योनि जैसे निकृष्ट कर्मों से छुटकारा मिल जाता है तथा कीर्ति, पुण्य एवं धन-धान्य की अभिवृद्धि होती है।

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अचला एकादशी 2018 की कहानी

प्राचीन काल में महीध्वज नामक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। धर्म कर्म के कार्यों में वो हमेशा आगे रहता था। प्रजा उससे बहुत प्रसन्न एवं संतुष्ट थी। धार्मिक होने के साथ साथ वो प्रजापालक भी था। जब कोई उससे सहायता मांगता तो वो कभी उसे खाली हाथ नहीं जाने देता था। उसका एक छोटा भाई था जिसका नाम वज्रध्वज था। विधि की विडंबना देखिये कि उसी का भाई बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई को अपना बैरी समझता था। उसने एक दिन अवसर पाकर अपने बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर दी और उसके मृत शरीर को जंगल में पीपल के वृक्ष के नीचे गाड़ दिया।

चूँकि राजा ना तो वीरगति को प्राप्त हुआ था ना ही प्राकृतिक मृत्यु मिली थी उसको मारा गया था इसलिए वो प्रेत योनि में पहुँच गया। राजा की आत्मा पीपल पर वास करने लगी और आने-जाने वालों को सताने लगी। अकस्मात् एक दिन धौम्य ऋषि उधर से निकले। प्रेत ने उन्हें भी डराने का प्रयास किया परन्तु उन्होंने तपोबल से प्रेत के उत्पात का कारण तथा उसके जीवन वृतांत को समझ लिया। अपने तेज़ से ऋषि ने प्रेत को शांत किया। शान्ति मिलते ही प्रेत पर राजा के सद्गुणों का प्रभाव बढ़ गया और उसने ऋषि को आदर के साथ प्रणाम किया। ऋषि महोदय ने प्रसन्न होकर प्रेत को पीपल के वृक्ष से उतारकर परलोक विद्या का उपदेश दिया। अंत में ऋषि ने प्रेत योनि से मुक्ति पाने के लिए अचला एकादशी 2018 का व्रत करने को कहा। अचला एकादशी व्रत करने से राजा दिव्य शरीर धारण कर स्वर्गलोक को चला गया।

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