Loading...

  • ५ - हनुमान जी का प्रस्थान

    जब लगि आवौं सीतहि देखी,
    होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
    यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा,
    चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ॥2॥

    *भावार्थ :* जब तक मैं सीताजी को देखकर (लौट) न आऊँ। काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदय में श्री रघुनाथजी को धारण करके हनुमान्‌जी हर्षित होकर चले ॥2॥

    |0|0