Loading...

  • ७ - पर्वत का पाताल में धसना

    जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता,
    चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
    जिमि अमोघ रघुपति कर बाना,
    एही भाँति चलेउ हनुमाना॥4॥

    जिस पर्वत पर हनुमान्‌जी पैर रखकर चले (जिस पर से वे उछले), वह तुरंत ही पाताल में धँस गया। जैसे श्री रघुनाथजी का अमोघ बाण चलता है, उसी तरह हनुमान्‌जी चले॥4॥

    |0|0