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  • ८ - समुन्द्र का हनुमान जी को दूत समझना

    जलनिधि रघुपति दूत बिचारी,
    तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥5॥

    समुद्र ने उन्हें श्री रघुनाथजी का दूत समझकर मैनाक पर्वत से कहा कि हे मैनाक! तू इनकी थकावट दूर करने वाला हो (अर्थात्‌ अपने ऊपर इन्हें विश्राम दे)॥5॥

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Krishna Kutumb
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