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  • १७ - राक्षसी का वर्णन

    चौपाई :
    * निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥
    जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥1॥

    भावार्थ : समुद्र में एक राक्षसी रहती थी। वह माया करके आकाश में उड़ते हुए पक्षियों को पकड़ लेती थी। आकाश में जो जीव-जंतु उड़ा करते थे, वह जल में उनकी परछाईं देखकर॥1॥

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