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  • २७ - लंका द्वार के राक्षसी का हनुमान से संवाद

    चौपाई :
    * मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
    नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥1॥

    भावार्थ : हनुमान्‌जी मच्छड़ के समान (छोटा सा) रूप धारण कर नर रूप से लीला करने वाले भगवान्‌ श्री रामचंद्रजी का स्मरण करके लंका को चले (लंका के द्वार पर) लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी। वह बोली- मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है?॥1॥

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Krishna Kutumb
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