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  • ३० - लंका द्वार के राक्षसी का हनुमान से संवाद

    बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥
    तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥4॥

    भावार्थ : जब तू बंदर के मारने से व्याकुल हो जाए, तब तू राक्षसों का संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं श्री रामचंद्रजी के दूत (आप) को नेत्रों से देख पाई॥4॥

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Krishna Kutumb
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