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  • ४२ - हनुमान जी का विभीषण से संवाद

    *तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीत न पद सरोज मन माहीं॥
    अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥2॥

    भावार्थ : मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होने से साधन तो कुछ बनता नहीं और न मन में श्री रामचंद्रजी के चरणकमलों में प्रेम ही है, परंतु हे हनुमान्‌! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्री रामजी की मुझ पर कृपा है, क्योंकि हरि की कृपा के बिना संत नहीं मिलते॥2॥

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Krishna Kutumb
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