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  • ४२ - हनुमान जी का विभीषण से संवाद

    * कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
    प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥4॥

    भावार्थ : भला कहिए, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? (जाति का) चंचल वानर हूँ और सब प्रकार से नीच हूँ, प्रातःकाल जो हम लोगों (बंदरों) का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले॥4॥

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