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  • ४२ - हनुमान जी का विभीषण से संवाद

    चौपाई :
    * जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
    एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥1॥

    भावार्थ : जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (श्री रघुनाथजी) को भुलाकर (विषयों के पीछे) भटकते फिरते हैं, वे दुःखी क्यों न हों? इस प्रकार श्री रामजी के गुण समूहों को कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय (परम) शांति प्राप्त की॥1॥

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