Loading...

  • ६७ - त्रिजटा राक्षशी के सपने का वर्णन

    * यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
    तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥4॥

    भावार्थ : मैं पुकारकर (निश्चय के साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार (कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गईं और जानकीजी के चरणों पर गिर पड़ीं॥4॥

    |0|0
Krishna Kutumb
ब्लॉग सूची 0 0 प्रवेश
Open In App