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  • ६९ - सीता जी का त्रिजटा राक्षशी से संवाद

    चौपाई :
    * त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
    तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥1॥

    भावार्थ : सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोलीं- हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्म हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता॥1॥

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Krishna Kutumb
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