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  • ७० - सीता जी का त्रिजटा राक्षशी से संवाद

    * आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
    सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥2॥

    भावार्थ : काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे। हे माता! फिर उसमें आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीति को सत्य कर दे। रावण की शूल के समान दुःख देने वाली वाणी कानों से कौन सुने?॥2॥

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Krishna Kutumb
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