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  • ७३ - सीता जी का मन में सोचना

    * पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
    सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥5॥

    भावार्थ : चंद्रमा अग्निमय है, किंतु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोक वृक्ष! मेरी विनती सुन। मेरा शोक हर ले और अपना (अशोक) नाम सत्य कर॥5॥

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