Loading...

  • ७७ - सीता जी के सामने हनुमान का आना

    * जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
    सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥2॥

    भावार्थ:-(वे सोचने लगीं-) श्री रघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी (माया के उपादान से सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनाई नहीं जा सकती। सीताजी मन में अनेक प्रकार के विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमान्‌जी मधुर वचन बोले-॥2॥

    |0|0
Krishna Kutumb
ब्लॉग सूची 0 0 प्रवेश