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  • ८२ - सीता जी के मन में विश्वास उत्पन्न होना

    दोहा :
    * कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास
    जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥13॥

    भावार्थ:-हनुमान्‌जी के प्रेमयक्त वचन सुनकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न हो गया, उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन और कर्म से कृपासागर श्री रघुनाथजी का दास है॥13॥

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