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  • ८४ - हनुमान जी का सीताजी से संवाद

    * अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
    कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥2॥

    भावार्थ:-मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित खर के शत्रु सुखधाम प्रभु का कुशल-मंगल कहो। श्री रघुनाथजी तो कोमल हृदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान्‌! उन्होंने किस कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है?॥2॥

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Krishna Kutumb
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