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  • ८५ - हनुमान जी का सीताजी से संवाद

    * सहज बानि सेवक सुखदायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
    कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥3॥

    भावार्थ:-सेवक को सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे श्री रघुनाथजी क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके कोमल साँवले अंगों को देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे?॥3॥

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Krishna Kutumb
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