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  • ९३ - हनुमान जी का सीताजी से संवाद

    * कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
    उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥5॥

    भावार्थ:-हनुमान्‌जी ने कहा- हे माता! हृदय में धैर्य धारण करो और सेवकों को सुख देने वाले श्री रामजी का स्मरण करो। श्री रघुनाथजी की प्रभुता को हृदय में लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दो॥5॥

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