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  • ९५ - हनुमान जी का सीताजी से संवाद

    चौपाई :
    * जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
    राम बान रबि उएँ जानकी। तम बरुथ कहँ जातुधान की॥1॥

    भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी ने यदि खबर पाई होती तो वे बिलंब न करते। हे जानकीजी! रामबाण रूपी सूर्य के उदय होने पर राक्षसों की सेना रूपी अंधकार कहाँ रह सकता है?॥1॥

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Krishna Kutumb
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