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  • १०२ - हनुमान जी का प्रेम में मग्न हो जाना

    *अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
    करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥2॥

    भावार्थ:-हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। श्री रघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' ऐसा कानों से सुनते ही हनुमान्‌जी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गए॥2॥

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Krishna Kutumb
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