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  • १०८ - हनुमान जी की रावण से शिकायत

    * नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
    खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥2॥

    भावार्थ:-(और कहा-) हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है। उसने अशोक वाटिका उजाड़ डाली। फल खाए, वृक्षों को उखाड़ डाला और रखवालों को मसल-मसलकर जमीन पर डाल दिया॥2॥

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