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  • ११४ - हनुमान जी द्वारा मेघनाथ के सेना का पतन

    * अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
    रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दई निज अंगा॥3॥

    भावार्थ:-उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और (उसके प्रहार से) लंकेश्वर रावण के पुत्र मेघनाद को बिना रथ का कर दिया। (रथ को तोड़कर उसे नीचे पटक दिया)। उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमान्‌जी अपने शरीर से मसलने लगे॥3॥

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Krishna Kutumb
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