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  • १२१ - हनुमान जी का रावण से सामना

    * कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
    देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥4॥

    भावार्थ:-देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रता के साथ भयभीत हुए सब रावण की भौं ताक रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान्‌जी के मन में जरा भी डर नहीं हुआ। वे ऐसे निःशंख खड़े रहे, जैसे सर्पों के समूह में गरुड़ निःशंख निर्भय) रहते हैं॥4॥

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