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  • १२४ - हनुमान जी का रावण से संवाद

    * मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
    सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया॥2॥

    भावार्थ:-तूने किस अपराध से राक्षसों को मारा? रे मूर्ख! बता, क्या तुझे प्राण जाने का भय नहीं है? (हनुमान्‌जी ने कहा-) हे रावण! सुन, जिनका बल पाकर माया संपूर्ण ब्रह्मांडों के समूहों की रचना करती है,॥2॥

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