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  • १२५ - हनुमान जी का रावण से संवाद

    * जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥
    जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥3॥

    भावार्थ:-जिनके बल से हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमशः) सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करते हैं, जिनके बल से सहस्रमुख (फणों) वाले शेषजी पर्वत और वनसहित समस्त ब्रह्मांड को सिर पर धारण करते हैं,॥3॥

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