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  • १३२ -हनुमान जी का रावण से संवाद

    *बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
    देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥4॥

    भावार्थ:-हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो। तुम अपने पवित्र कुल का विचार करके देखो और भ्रम को छोड़कर भक्त भयहारी भगवान्‌ को भजो॥4॥

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Krishna Kutumb
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