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  • १३५ - हनुमान जी का रावण से संवाद

    चौपाई :
    * राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥
    रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥1॥

    भावार्थ:-तुम श्री रामजी के चरण कमलों को हृदय में धारण करो और लंका का अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यजी का यश निर्मल चंद्रमा के समान है। उस चंद्रमा में तुम कलंक न बनो॥1॥

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