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  • १३८ - हनुमान जी का रावण से संवाद

    * सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
    संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥4॥

    भावार्थ:-हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुख की रक्षा करने वाला कोई भी नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी श्री रामजी के साथ द्रोह करने वाले तुमको नहीं बचा सकते॥4॥

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Krishna Kutumb
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