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  • १४२ - रावण का क्रोध होना

    * सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
    सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥3॥

    भावार्थ:-हनुमान्‌जी के वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया। (और बोला-) अरे! इस मूर्ख का प्राण शीघ्र ही क्यों नहीं हर लेते? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े उसी समय मंत्रियों के साथ विभीषणजी वहाँ आ पहुँचे॥3॥

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Krishna Kutumb
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