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  • १४३ - हनुमान जी को दंड देना

    * नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
    आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥4॥

    भावार्थ:-उन्होंने सिर नवाकर और बहुत विनय करके रावण से कहा कि दूत को मारना नहीं चाहिए, यह नीति के विरुद्ध है। हे गोसाईं। कोई दूसरा दंड दिया जाए। सबने कहा- भाई! यह सलाह उत्तम है॥4॥

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Krishna Kutumb
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