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  • १४७ - हनुमान जी का मुस्कुराना

    * बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥
    जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥2॥

    भावार्थ:-यह वचन सुनते ही हनुमान्‌जी मन में मुस्कुराए (और मन ही मन बोले कि) मैं जान गया, सरस्वतीजी (इसे ऐसी बुद्धि देने में) सहायक हुई हैं। रावण के वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही (पूँछ में आग लगाने की) तैयारी करने लगे॥2॥

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