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  • १५५ - हनुमान जी का समुद्र में कूदना

    * ताकर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
    उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥4॥

    भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं-) हे पार्वती! जिन्होंने अग्नि को बनाया, हनुमान्‌जी उन्हीं के दूत हैं। इसी कारण वे अग्नि से नहीं जले। हनुमान्‌जी ने उलट-पलटकर (एक ओर से दूसरी ओर तक) सारी लंका जला दी। फिर वे समुद्र में कूद पड़े॥

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Krishna Kutumb
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