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  • १ ५ ८ - हनुमान जी का सीता जी से संवाद

    * कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
    दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ सम संकट भारी॥2॥

    भावार्थ:-(जानकीजी ने कहा-) हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना- हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकार से पूर्ण काम हैं (आपको किसी प्रकार की कामना नहीं है), तथापि दीनों (दुःखियों) पर दया करना आपका विरद है (और मैं दीन हूँ) अतः उस विरद को याद करके, हे नाथ! मेरे भारी संकट को दूर कीजिए॥2॥

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