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  • १५९ - हनुमान जी का सीता जी से संवाद

    * तात सक्रसुत कथा सनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
    मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥3॥

    भावार्थ:-हे तात! इंद्रपुत्र जयंत की कथा (घटना) सुनाना और प्रभु को उनके बाण का प्रताप समझाना (स्मरण कराना)। यदि महीने भर में नाथ न आए तो फिर मुझे जीती न पाएँगे॥3॥

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Krishna Kutumb
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