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  • १६० - हनुमान जी का सीता जी से संवाद

    * कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
    तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥4॥

    भावार्थ:-हे हनुमान्‌! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ! हे तात! तुम भी अब जाने को कह रहे हो। तुमको देखकर छाती ठंडी हुई थी। फिर मुझे वही दिन और वही रात!॥4॥

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Krishna Kutumb
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