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  • १७०- श्री राम जी का हर्षित होना

    * राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
    फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥4॥

    भावार्थ:-श्री रामजी ने जब वानरों को कार्य किए हुए आते देखा तब उनके मन में विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिला पर बैठे थे। सब वानर जाकर उनके चरणों पर गिर पड़े॥4॥

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Krishna Kutumb
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