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  • १७२ - जाम्बवान् और प्रभु श्री राम का संवाद

    चौपाई :
    * जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
    ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥1॥

    भावार्थ:-जाम्बवान्‌ ने कहा- हे रघुनाथजी! सुनिए। हे नाथ! जिस पर आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरंतर कुशल है। देवता, मनुष्य और मुनि सभी उस पर प्रसन्न रहते हैं॥1॥

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Krishna Kutumb
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