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  • १७४ - जाम्बवान् और प्रभु श्री राम का संवाद

    * नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
    पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥3॥

    भावार्थ:-हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान्‌ ने जो करनी की, उसका हजार मुखों से भी वर्णन नहीं किया जा सकता। तब जाम्बवान्‌ ने हनुमान्‌जी के सुंदर चरित्र (कार्य) श्री रघुनाथजी को सुनाए॥3॥

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Krishna Kutumb
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