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  • १७५ - हनुमान जी और श्री राम जी की मुलाकात

    * सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
    कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥4॥

    भावार्थ:-(वे चरित्र) सुनने पर कृपानिधि श्री रामचंदजी के मन को बहुत ही अच्छे लगे। उन्होंने हर्षित होकर हनुमान्‌जी को फिर हृदय से लगा लिया और कहा- हे तात! कहो, सीता किस प्रकार रहती और अपने प्राणों की रक्षा करती हैं?॥4॥

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Krishna Kutumb
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