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  • १७७ - हनुमान जी और श्री राम जी का संवाद

    चौपाई :
    * चलत मोहि चूड़ामनि दीन्हीं। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
    नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥1॥

    भावार्थ:-चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि (उतारकर) दी। श्री रघुनाथजी ने उसे लेकर हृदय से लगा लिया। (हनुमान्‌जी ने फिर कहा-) हे नाथ! दोनों नेत्रों में जल भरकर जानकीजी ने मुझसे कुछ वचन कहे-॥1॥

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Krishna Kutumb
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