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  • १७ ८ - हनुमान जी और श्री राम जी का संवाद

    * अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
    मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥2॥

    भावार्थ:-छोटे भाई समेत प्रभु के चरण पकड़ना (और कहना कि) आप दीनबंधु हैं, शरणागत के दुःखों को हरने वाले हैं और मैं मन, वचन और कर्म से आपके चरणों की अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी (आप) ने मुझे किस अपराध से त्याग दिया?॥2॥

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Krishna Kutumb
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