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  • १७९ - हनुमान जी और श्री राम जी का संवाद

    * अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
    नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥3॥

    भावार्थ:-(हाँ) एक दोष मैं अपना (अवश्य) मानती हूँ कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गए, किंतु हे नाथ! यह तो नेत्रों का अपराध है जो प्राणों के निकलने में हठपूर्वक बाधा देते हैं॥3॥

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Krishna Kutumb
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