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  • १९१ - हनुमान जी और श्री राम जी का संवाद

    * साखामग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
    नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥4॥

    भावार्थ:-बंदर का बस, यही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर चला जाता है। मैंने जो समुद्र लाँघकर सोने का नगर जलाया और राक्षसगण को मारकर अशोक वन को उजाड़ डाला,॥4॥

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Krishna Kutumb
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