Loading...

  • १९५ - हनुमान जी और श्री राम जी का संवाद

    * उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
    यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥2॥

    भावार्थ:-हे उमा! जिसने श्री रामजी का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती। यह स्वामी-सेवक का संवाद जिसके हृदय में आ गया, वही श्री रघुनाथजी के चरणों की भक्ति पा गया॥2॥

    |0|0