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  • २०२ - वानर और भालू का गर्जना

    * जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहिं सोई॥
    चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥4॥

    भावार्थ:-जानकीजी को जो-जो शकुन होते थे, वही-वही रावण के लिए अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं॥4॥

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Krishna Kutumb
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