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  • २०४ - सेना का वर्णन

    छंद :
    * चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
    मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥
    कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
    जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥1॥

    भावार्थ:-दिशाओं के हाथी चिंग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत चंचल हो गए (काँपने लगे) और समुद्र खलबला उठे। गंधर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब के सब मन में हर्षित हुए' कि (अब) हमारे दुःख टल गए। अनेकों करोड़ भयानक वानर योद्धा कटकटा रहे हैं और करोड़ों ही दौड़ रहे हैं। 'प्रबल प्रताप कोसलनाथ श्री रामचंद्रजी की जय हो' ऐसा पुकारते हुए वे उनके गुणसमूहों को गा रहे हैं॥1॥

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Krishna Kutumb
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