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  • २०५ - सेना का वर्णन

    * सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
    गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई॥
    रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
    जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥2॥

    भावार्थ:-उदार (परम श्रेष्ठ एवं महान्‌) सर्पराज शेषजी भी सेना का बोझ नहीं सह सकते, वे बार-बार मोहित हो जाते (घबड़ा जाते) हैं और पुनः-पुनः कच्छप की कठोर पीठ को दाँतों से पकड़ते हैं। ऐसा करते (अर्थात्‌ बार-बार दाँतों को गड़ाकर कच्छप की पीठ पर लकीर सी खींचते हुए) वे कैसे शोभा दे रहे हैं मानो श्री रामचंद्रजी की सुंदर प्रस्थान यात्रा को परम सुहावनी जानकर उसकी अचल पवित्र कथा को सर्पराज शेषजी कच्छप की पीठ पर लिख रहे हों॥2॥

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