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  • २०९ - मंदोदरी का रावण को समझाना

    * रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
    कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥3॥

    भावार्थ:-वह एकांत में हाथ जोड़कर पति (रावण) के चरणों लगी और नीतिरस में पगी हुई वाणी बोली- हे प्रियतम! श्री हरि से विरोध छोड़ दीजिए। मेरे कहने को अत्यंत ही हितकर जानकर हृदय में धारण कीजिए॥3॥

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Krishna Kutumb
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