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  • २११ - मंदोदरी का रावण को समझान

    दोहा :
    *तव कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥
    सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥5॥

    भावार्थ:-सीता आपके कुल रूपी कमलों के वन को दुःख देने वाली जाड़े की रात्रि के समान आई है। हे नाथ। सुनिए, सीता को दिए (लौटाए) बिना शम्भु और ब्रह्मा के किए भी आपका भला नहीं हो सकता॥5॥

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Krishna Kutumb
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